Kabir ke guru kaun the | कबीर दास के गुरु कौन थे?

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Kabir ke guru kaun the | कबीर के गुरु कौन थे?

Kabir ke guru kaun the, संत कबीर के दोहे हम सभी बचपन से ही अपनी किताबों में पढ़ते हुए बड़े हुए हैं। यही वजह है कि आज उनको मानने वाले सिर्फ हमारे देश में ही नहीं, बाल्कि पूरी दुनिया में लोग मौजूद हैं। लेकिन बहुत से लोग आज भी संत कबीर के बारे में अच्‍छे से नहीं जानते हैं। यदि आप भी संत कबीर के जीवन के बारे में नहीं जानते हैं। तो हमारे इस लेख को अंत तक पढि़ए।

अपने इस लेख में हम आपको बताएंगे कि संत कबीर के गुरु कौन थे? दुनिया को लेकर उनके क्‍या विचार थे। साथ ही कबीर के प्रमुख दोहे कौन से हैं और उनका क्‍या मतलब होता है।

संत कबीर कौन थे?

संत कबीर के बारे में अभी तक जो भी जानकारी मिली हैं। उसकी सत्‍यता की अभी तक कोई पुष्टि नहीं है। क्‍योंकि उन्‍होंने अपने जीवन के बारे में अक्‍सर कभी कुछ जिक्र नहीं किया है। लेकिन जो कि सर्वमान्‍य है वो ये है कि वो यूपी के वाराणसी में 15 वीं सदी में वो पैदा हुए थे। माना जाता है कि वो एक मुस्लिम परिवार से थे। लेकिन वो कभी भी किसी विशेष धर्म के समर्थक या विरोधी के तौर पर अपने विचार नहीं व्‍यक्‍त करते थे।

वो हमेशा मानवता की बात करते थे। लेकिन अक्‍सर वो मूर्ति पूजा का विरोध करते थे, इससे लोगों को लगता था कि वो हिंदू धर्म का विरोध करते थे। लेकिन ऐसा बिल्‍कुल नहीं था। कहा जाता है कि कबीर कमल के फूल पर अपने माता पिता को मिले थे। साथ ही मगहर में जाकर उन्‍होंने अपना शरीर छोड़ दिया था। जहां आज उनकी मजार भी है। जिसे पूरी दुनिया से लोग देखने आते हैं।

संत कबीर के बारे में जानने के बाद चलिए अब जानते है कि Kabir ke guru kaun the, कबीर के गुरु का नाम क्या था।

Kabir ke guru kaun the | कबीर के गुरु का नाम क्या था?

संत कबीर वैसे तो सर्वज्ञानी थे। परन्‍तु उन्‍होंने फिर भी अपना गुरू रामानंद को बनाया था। क्‍योंकि उनका मानना था कि यदि उनका कोई गुरू नहीं होगा तो शायद उनकी बातों को लोग स्‍वीकार नहीं करेंगे ये सोचकर कि इनका तो कोई गुरू ही नहीं है। ऐसे में इनका ज्ञान लेने योग्‍य नहीं है।

लेकिन उन्‍हें गुरू इतनी आसानी से नहीं मिले। क्‍योंकि उस दौरान छूआ छूत का जोर बहुत था। ऐसे में जब वो अपने गुरू रामानंद से मिलने गए तो उन्‍होंने कबीर को अपना शिष्‍य बनाने से साफ इंकार कर दिया। क्‍योंकि वो नीची जाति से थे और उन दिनों छुआछूत की भावना काफी ज्‍यादा थी कोई भी ऊंची जाति‍ का आदमी नीची जाति के आदमी को अपना शिष्‍य तक नहीं बना सकता था।

इसके बाद कबीर ने एक चाल चली। दरअसल रामानंद हर रोज पास गंगा में स्‍नान करने जाते थे। इसलिए कबीर ने एक दिन तय किया वो सुबह सुबह जाकर गंगा की सीढि़यों में लेट जाएंगे। ऐसे में जब रामानंद सुबह अंधेरे में आंएगे तो उनसे टकरा जाएंगे। बस यहीं से छुआ छूत की भावना समाप्‍त हो जाएगी।

कबीर एकदम ऐसा ही करते हैं। रामानंद जब उस दिन गंगा किनारे आ रहे होते हैं। तो अचानक उनका खराऊं कबीर से सिर से टकरा जाता है। बस तभी कबीर रोने लगते हैं। जिसके बाद रामानंद बिना कुछ सोचे समझे उन्‍हें चुप कराते हैं। और उन्‍हें अपनी कुटिया पर ले जाते हैं। क्‍योंकि रामानंद को लगता है कि ये कोई बच्‍चा है जो देर रात को रास्‍ता भटक गया होगा और यहीं सो गया होगा।

इसके बाद रामानंद कबीर को अपने घर ले जाते हैं। लेकिन जब उन्‍हें पता चलता है कि ये तो नीच जाति का कबीर है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इसके बाद कबीर और रामानंद के बीच गुरू और शिष्‍य का रिश्‍ता जुड़ जाता है। इसके बाद कबीर शिष्‍य और रामानंद गुरू की भूमिका में आ जाते हैं।

आशा है कि अब आप ये समझ चुकें है कि Kabir ke guru kaun the, और कबीर ने अपना गुरु किसे बनाया।

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कबीर के कुछ जाने माने दोहे

वैसे तो संत कबीर ने अपन पूरे जीवन में अनगिनत दोहे लिखे हैं। लेकिन हम यहां आपको संत कबीर के तीन मशहूर दोहे बताने जा रहे हैं। जो‍ कि आज भी लोगों की जुबान पर मानो रटे हैं।

पोथी पढि़ पढि़ जग मुआ, पंडि़त भया ना कोय, ढाई आखर प्रेम का पढ़े, सो पंडित होय

अर्थ: अपने इस दोहे में संत कबीरदास कहना चाहते हैं कि कभी भी कोई इंसान किताबें पढ़कर महान नहीं बन सकता है। उसके लिए उसे जरूरत होती है कि वो एक अच्‍छा इंसान बने। यदि उसने इंस‍ानियत और प्रेम के कुछ शब्‍द भी पढ़ लिए तो बहुत सारी किताबों के पढ़ने के ज्ञान से कहीं बेहतर होगा। वास्‍तव में आज यही बात सही भी है।

ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोये, औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय

कबीर अपने इस दोहे में उन लोगों को कहना चाहते हैं जो कि हमेशा कटु शब्‍द बोलते हैं। कबीर उनसे कहना चाहते हैं कि आपको चाहिए कि आप ऐसी बात बोलिए जिससे आपका मन तो प्रसन्‍न तो हो ही। साथ ही आपकी बात जो व्‍यक्ति सुने उसका मन भी प्रसन्‍न हो। ताकि समाज में जो नफरत और भेदभाव की भावना बढ़ती जा रही है, उसे समाप्‍त किया जा सके।

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलिया कोय, जो दिल खोजा आ पना, मुझसे बुरा ना कोय

कबीर का ये दोहा आज के समय पर एकदम सही बैठता है। कबीर इसमें कहना चाहते हैं कि आप पूरी दुनिया में बुरे इंसान की तलाश मत कीजिए। बुरे इंसान की तलाश करने से पहले आप अपने अंदर खुद झांकिए। क्‍या पता आप ही वो बुरे इंसान हों जिसे आप दुनिया में तलाशने निकले हों। इसलिए यदि आप दुनिया बदलना चाहते हैं तो आप दूसरे लोगों को नहीं बाल्कि आप खुद में बदलाव कीजिए। खुद की बुराई की तलाश कीजिए।

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क्‍या संत कबीर भगवान थे?

बहुत से लोग संत कबीर को भगवान, युग पुरूष, देवता के रूप में भी मानते हैं। उनका कहना होता है कि संत कबीर ने जिस तरह से चमत्‍कार दिखाए हैं वो कोई भगवान ही कर सकता है। लेकिन इस बात का खंडन कबीर उस दौरान वो स्‍वंय किया करते थे। उनका कहना था कि लोग उनके विचारों को अपनाएं और आगे बढ़े। उन्‍हें भगवान कोई भी ना माने। लेकिन इसके बाद भी बहुत से लोग कबीर को अलग अलग संज्ञा देते हैं। आज भी बहुत से लोग अपने घरों में संत कबीर की तस्‍वीर लगाकर उसकी पूजा पाठ करते हैं। जो कि बिल्‍कुल गलत है।

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कबीर के प्रमुख विचार

  • कबीर कहते थे कि पूजा पाठ की जगह कर्म में यकीन रखो। इसलिए सदैव अच्‍छे कर्म करो जिससे आपको जीवन के अंत में मोक्ष की प्राप्‍ति हो।
  • कबीर कहते थे कि आप किसी भी धर्म या जाति के संबध रखते हों पर मानवता का फर्ज अवश्‍य निभाएं। इसलिए लोगों की मदद को हमेशा हाथ बढ़ाएं।
  • उन्‍होंने कहा था कि जीवन हर काम धैर्य रखने से होता है। यदि कोई माली अपने पौधे में एक ही दिन में सौ बाल्‍टी पानी दे दे, तो भी वो अपना फूल सीजन में ही देगा।
  • किसी भी इंसान का काम से ज्‍यादा महान नहीं बनता है। इसके लिए जरूरत होती है कि उसके विचार अच्‍छे और नेक हों।

आज आपने जाना कि कबीर के गुरु का नाम क्या था यानि Kabir ke guru kaun the. आशा है अब आपके इस सवाल का जवाब मिल गया होगा कि कबीर के गुरु कौन थे, आपको यह लेख कैसा लगा हमें कमेंट में जरुर लिखें।

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उम्र में युवा और तजुर्बे में वरिष्ठ रोहित यादव हरियाणा के रहने वाले हैं। पत्रकारिता में डिग्री रखने के साथ इन्होंने अपनी सेवाएं कई मीडिया संस्थानों को दी हैं। फिलहाल ये पिछले लंबे समय से अपनी सेवाएं 'All in Hindi' को दे रहे हैं।

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