Red data book kya hai | रेड डाटा बुक किसे कहते हैं?

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रेड डाटा बुक क्‍या है | Red data book in Hindi

Red Data Book Kya Hai यदि आपको इसकी जानकारी नहीं है तो आप बिलकुल सही स्थान पर है क्योकि आज अपने इस लेख में हम आपको ‘रेड डाटा बुक’ के बारे में जानकारी देंगे। red data pustak kya hai? रेड डाटा बुक क्‍या काम करती है? रेड डाटा बुक को कब प्रकाशित किया गया था? इसके फायदे और नुकसान क्‍या होते हैं। इसलिए यदि आप भी जानना चाहते हैं कि रेड डाटा बुक क्‍या है। तो हमारे इस लेख को अंत तक पढि़ए।

आज दुनिया में तकनीक बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है। एक समय था जब इंसानों का आंकड़ा ही रखना बेहद कठिन काम होता था, परन्‍तु आज की दुनिया में जानवरों की जानकारी भी आसानी से सुरक्षित रखी जा सकती है। रेड डाटा बुक भी कुछ इसी तरह के दस्तावेज का कलेक्शन है। चलिए विस्तार से जानते है कि रेड डाटा बुक क्‍या है?

Red data book kya hai?

रेड डाटा बुक एक तरह का सार्वजनिक दस्‍तावेज है। जो कि जानवरों और पेड़ पौधों से संबधित जानकारी रखता है। इसके अंदर जानकारी दी गई होती है। कि कौनसा जानवर दुनिया में इस समय सबसे ज्‍यादा कहां पर है। साथ ही उसकी क्या स्‍थिति है। यदि वह विलुप्‍त हो गया है तो उसे आखिरी बार कहां देखा गया था।

साथ ही यदि वह विलुप्‍त होने की कगार पर पहुंच चुका है, तो उसकी संख्‍या अभी कितनी बची हुई है। इस किताब की खास बात ये है कि इसे कोई भी इंसान पढ़ और जान सकता है। इस किताब के अंदर विलुप्‍त होने की कगार पर पहुंच चुके जानवरों के संरक्षण के उपाय भी सुझाए गए होते हैं।

रेड डाटा बुक क्‍या है

आपको जानकर हैरानी होगी कि इस किताब के अंदर अब तक भारत में कुल 132 पेड़ पौधे और जानवर ऐसे शामिल किए गए हैं। जो कि विलुप्‍त होने की कगार पर पहुंच चुके हैं। यदि हमने इन पर संज्ञान नहीं लिया तो आने वाले समय में ये भी विलुप्‍त हो जाएंगी।

इस प्रकार आशा है अब आप समझ चुकें होंगे कि रेड डाटा बुक क्‍या है।

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ग्रीन डाटा बुक क्‍या है?

अभी ऊपर आपने जाना कि रेड डाटा बुक क्‍या है, रेड डाटा बुक की बात हुई है तो यदि ग्रीन डाटा बुक की बात ना की जाय यह उचित नहीं है इसलिए चलिए अब जानते है कि ग्रीन डाटा बुक क्‍या है

कई बार हम रेड और ग्रीन डाटा बुक (Green Data Book) को एक ही समझने लगते हैं। लेकिन वास्‍तव में ऐसा बिल्‍कुल भी नहीं है। दरअसल ग्रीन डाटा बुक (Green Data Book) एक तरह से पर्यावरण से जुड़ी जानकारी रखने वाली किताब है। जो‍िकि बेहद छोटे आकार की होती है। इसलिए इसे पॉकेट साइज बुक भी कहते हैं।

इसके अंदर दुनिया की 200 से अधिक अर्थव्यवस्थाओं के पर्यावरणीय डेटा शामिल हैं। यह विश्व विकास संकेतकों पर आधारित है। कृषि, वानिकी, जैव विविधता, प्रदूषण और स्वच्छता प्रमुख संकेतक हैं। जिसके आधार पर हम पर्यावरण से जुड़ी चीजों को जान सकते हैं।

रेड डाटा बुक का विभाजन कितने भागों में किया गया है?

रेड डाटा बुक क्‍या है जानने के बाद चलिए अब जानते है कि रेड डाटा बुक का विभाजन कितने भागों में किया गया है।

रेड डाटा बुक को कई भागों में बांटा गया है। जिससे इसे पढ़ने और समझने में लोगों को आसानी रहती है। आइए आपको इसके विभिन्‍न भागों से परिचित कराते हैं। यहां हम आपको इसके कुछ प्रमुख भागों की जानकारी ही प्रदान करेंगे।

  • इस किताब के अंदर कुछ काले रंग (Black Color) के पेज होते हैं। यदि हम काले पेज के अंदर की बात करें तो इसके अंदर उन प्रजातियों को रखा जाता है जिनके विलुप्‍त होने की पुष्टि हो चुकी है। यानि अब इन्‍हें दोबारा नहीं पाया जा सकता है।
  • इसके बाद इसके अंदर लाल रंग (Red Color) का पेज आता है। जिसमें उन प्रजातियों को दर्शाया जाता है जो कि एक तरह लुप्‍त मान ली गई हैं। लेकिन अभी इनकी पूर्णत पुष्टि नहीं हुई है।
  • एम्‍बर पेज के अंदर उन प्रजातियों को रखा जाता है जिनकी स्‍थिति फिलहाल बेहद कमजोर हो चुकी है। इसलिए यह एक संकेत होता है कि इन पर जल्‍द से जल्‍द ध्‍यान दिया जाए। अन्‍यथा इन पर भी खतरा मंडरा सकता है।
  • कुछ दुर्लभ प्रजातियां होती हैं जिन्‍हें सफेद रंग (White color) के पेज के अंदर रखा जाता है।
  • इस किताब के अंदर एक हरे रंग का पेज होता है। जिसके अंदर उन प्रजातियों को रखा जाता है जो कि पहले एक तरह से संकट के अंदर थी। लेकिन अब उनके अंदर सुधार देखा जा रहा है। जो कि एक तरह से सकारात्‍मक संदेश होता है।
  • ग्रे रंग (Grey Color) के पेज के अंदर उन प्रजातियों को रखा जाता है। जिनका प्रर्याप्‍त रूप से डाटा मौजूद नहीं है। इसलिए इन प्रजातियों पर कुछ कहा नहीं जा सकता है।
  • इसके अंदर एक तरह की अलग से जानकारी दी गई होती है जिन्‍हें कहा जाता है कि अब ये जंगलों से विलुप्‍त हो चुकी हैं। इसलिए इनकी जो भी संख्‍या बची है वो केवल चिडि़याघर या अन्‍य जगहों पर सुरक्षित रखे जानवरों की बची है।

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रेड डाटा बुक का प्रकाशन कौन करता है?

रेड डाटा बुक (Red Data Book) का प्रकाशन IUCN यानि International union Of Conservation Nature के द्वारा किया जाता है। इसका मुख्‍यालय स्‍विजरलैंड में है। यह रेड डाटा बुक का प्रकाशन करता है। यदि हम प्रथम रेड डाटा बुक के प्रकाशन की बात करें तो यह 1 जनवरी 1972 को प्रकाशित की गई थी।

इसकी खास बात ये है इसकी प्रकाशित पुस्‍तक में दिए गए आंकडे को हर देश सर्वसम्‍मति से मानता है और सुझावों पर अमल भी करता है। पूरी दुनिया में अब तक इसकी तरफ से कुल पांच प्रकार की रेड डाटा बुक को प्रक‍ाश्ति किया गया है। आइए आपको इन सभी प्रकार के बारे में विस्‍तार से जानकारी देते हैं।

  • इस पुस्‍तक के प्रथम चरण में ऐसी प्रजातियों को रखा गया था। जो कि अपने छोटे छोटे बच्‍चों को जन्‍म देती हैं और उनकी देख भाल करने के साथ उन्‍हें दूध भी पिलाती हैं। इन्‍हें स्‍तनधारी जानवर भी कहा जाता है। इस पुस्तक में इस तरह की प्रजाति के बारे में जानकारी दी गई है।
  • दूसरे चरण में ऐसे पक्षियों को रखा जाता है, जो कि हमारे आसपास हवा में उड़ते देखे जा सकते हैं। इसमें इनके ऊपर मंडराते खतरे के बारे में जानकारी दी गई है।
  • तीसरे चरण में ऐसे जानवरों को रखा जाता है जो कि मरूस्‍थलीय क्षेत्रों में रहते हैं। इन्‍हें उभयचर भी कहा जाता है।
  • चौथे चरण के अंदर ऐसे जानवर होते हैं जो कि पानी के अंदर रहते हैं। जैसे कि मछली और दूसरे जलीय जानवर।
  • पांचवे चरण के अदंर सभी तरह के पेड़ पोधे रखे जाते हैं। जो कि किसी भी तरह से संकट की तरफ जा रहे हैं। इनके बारे में जानकारी दी गई होती है।

भारत में संकटग्रस्त कुछ प्रमुख प्रजातियां

आइए अब हम आपको कुछ उन प्रमुख प्रजातियों के नाम बताते हैं। जो‍िकि वर्तमान समय में संकट में हैं। यदि इन्‍हें हम सभी लोग मिलकर सहेजते हैं, तो इन्‍हें इस संकट से बाहर निकाला जा सकता है।

  • जंगली उल्‍लू
  • लाल सिर वाला गिद्ध
  • ग्रेट इंडियन बुयटर्ड
  • चम्‍मच की चोंच वाला टिटहरी
  • जेरडॉन्‍स करसर
  • चरस
  • सफेद पेट वाला बगुला
  • हिमालयी बटेर
  • सोसिएबल लैपविंग
  • साइबेरियन क्रेन

रेड डाटा बुक के लाभ

रेड डाटा बुक क्‍या है यह समझ लेने के बाद आइए अब हम आपको रेड डाटा बुक (Red Data Book) के कुछ लाभ बताते हैं। जो‍ कि इसके प्रकाशित होने से हम सभी को हुआ है।

  • रेड डाटा बुक की मदद से हम सभी उन प्रजातियों के बारे में जान पाते हैं। जो कि दुनिया में या तो संकट के दौर से गुजर रही हैं। या उनके विलुप्‍त होने की संभावना जताई जा रही है। इससे इन्‍हें बचाने में आसानी रहती है।
  • इस किताब की मदद से हम यदि चाहे तो किसी विशेष प्रकार की प्रजाति के बारे में जानकारी जुटा सकते हैं। वो भी बेहद आसानी से। खास बात ये है कि इसका आंकड़ा किसी एक देश को ध्‍यान में ना रखकर बाल्कि पूरी दुनिया की जानकारी देने का काम करता है।
  • इस किताब के अंदर प्राय जो कि लुप्‍त होने की के कगार पर प्रजाति जाने वाली हैं। उनकी सुरक्षा के लिए उपाय भी सुझाए जाते हैं। जिनकी मदद से हम उनकी सुरक्षा कर सकते हैं। जिससे उन्‍हें संकट से बाहर निकाला जाता है।
  • इस पुस्‍तक से पहले ऐसी कोई भी पुस्‍तक नहीं थी। जो कि इस तरह की बेजुबान जानवरों की जानकारी साझा कर सके। लेकिन इस किताब ने एक तरह से बेजुबान जानवरों की आवाज को आम लोगों तक पहुंचाने का काम किया है।

रेड डाटा बुक के कुछ नुकसान

आपने अभी जाना कि रेड डाटा बुक (Red Data Book) के अनेकों फायदे हैं। जिनकी मदद से जानवरों के बारे में जानकारी जुटाना काफी आसान हो गया है। आइए अब आपको हम आपको इसके कुछ नुकसान के बारे में जानकारी देते हैं।

  • इस किताब के अंदर कई बार आधी अधूरी जानकारी दी जाती है। क्‍योंकि इसका अंदाजा लगाना बेहद कठिन है कि इस समय दुनिया में किसी जीव की कोई प्रजाति कितनी संख्‍या में बची है। क्‍योंकि जानवर हमेशा जंगलों में ही छिपकर रहते हैं।
  • कई बार इस किताब के अंदर दी गई जानकारी विवादों में भी फंस गई है। जो कि बताती है कि इस किताब पर कभी भी पूरी तरह से भरोसा नहीं किया जा सकता है।
  • यह किताब सभी पेड़ पौधे, जानवर के बारे में जानकारी देती है। पर इन्‍हीं से मिलती जुलती एक प्रजाति रोगाणु की भी है। जिनके बारे में इस किताब के अंदर किसी तरह की जानकारी नहीं दी जाती है। जिससे कहा जा सकता है कि यह पूरी तरह से जानकारी नहीं देती है।

आशा है अब आप समझ चुकें होंगे कि Red data book kya hai और रेड डाटा बुक के फायदे और नुकसान क्या है। यह जानकारी आपको कैसी लगी हमें कमेंट में जरुर बताएं।

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नमस्कार दोस्तों, मैं रवि "आल इन हिन्दी" का Founder हूँ. मैं एक Economics Graduate हूँ। कहते है ज्ञान कभी व्यर्थ नहीं जाता कुछ इसी सोच के साथ मै अपना सारा ज्ञान "आल इन हिन्दी" द्वारा आपके साथ बाँट रहा हूँ। और कोशिश कर रहा हूँ कि आपको भी इससे सही और सटीक ज्ञान प्राप्त हो सकें।

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