एक देश एक चुनाव क्‍या है | One Nation One Election kya hai?

One Nation One Election kya hai: ‘एक देश एक चुनाव’ की चर्चा आपने कई बार सुनी होगी। लेकिन शायद आपको समझ ना आया हो कि एक देश एक चुनाव क्‍या है। क्‍योंकि इसे समझना बेहद ही जटिल प्रक्रिया है। इसलिए यदि आप समझना चाहते हैं कि एक देश एक चुनाव क्‍या है तो हमारे इस लेख को अंत तक पढि़ए।

अपने इस लेख में हम एक देश एक चुनाव की पूरी प्रक्रिया को समझाएंगे। साथ ही इसके क्‍या फायदे हैं और क्‍या नुकसान इसकी भी पूरी जानकारी देंगे। इसके अलावा दुनिया के उन देशों का जिक्र भी करेंगे जहां एक देश एक चुनाव की प्रक्रिया फिलहाल लागू है।

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‘एक देश एक चुनाव’ क्‍या है?

यदि हम बात करें कि एक देश एक चुनाव क्‍या है तो इसका स्‍पष्‍ट सा मतलब ये है कि आपको इसके अंदर लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ देखने को मिलते हैं। जो कि हमारे देश में अभी अलग अलग होते हैं। उदाहरण के तौर पर आप यदि हरियाणा में रहते हैं तो लोकसभा के चुनाव हर 5 साल में मई के महीने में होते हैं। लेकिन उसी साल अक्‍टूबर और नवंबर के महीने में विधानसभा के चुनाव भी होते हैं।

यानि एक बार आप प्रधानमंत्री को चुनने के लिए वोट देते हैं। जबकि एक बार आप अपने राज्‍य के मुख्‍यमंत्री को चुनने के लिए वोट देते हैं। यही हाल कमोवेश हमारे देश के हर राज्‍य का है। बस लोकसभा और विधानसभा के चुनावों का समय बदलता रहता है।

एक देश एक चुनाव

क्‍या 1947 से ही ये समस्‍या है?

नहीं, एक देश एक चुनाव की समस्‍या आजादी के दौरान नहीं थी। क्‍योंकि जब हमें आजादी मिली थी तो पहली बार चुनाव 1951 में शुरू हुए थे और 1952 में संपन्‍न हुए थे। ऐसे में उस समय सभी राज्‍यों और केन्‍द्र में एक साथ ही चुनाव हुए थे। जिससे हर 5 साल बाद दोबारा से चुनाव का समय आ जाता था और किसी तरह की समस्‍या नहीं रहती थी। लेकिन कई बार राज्‍यों की विधानसभा को बीच में ही भंग करना पड़ा जिससे ये प्रक्रिया टूटती चली गई।

यदि हम आंकड़ों की बात करें तो 1951 से 1967 के बीच दोनों चुनाव समय पर हुए। फिर 1957 से लेकर 1962 के बीच दोनों चुनाव समय पर हुए। इसके बाद 1967 तक भी ये सिलसिला चलता रहा था। लेकिन 1968 और 1969 के बीच कई विधानसभाएं भंग कर दी गई थी। जबकि 1970 में लोकसभा भंग कर दी गई थी। इसके बाद ये सिलसिला ऐसा टूटा कि आज हालात ये है कि हर 3 से 4 महीने में किसी ना किसी राज्‍य में चुनाव का बिगुल बज ही जाता है।

BJP ही ‘एक देश एक चुनाव’ क्‍यों लाना चाहती है?

केन्‍द्र में जब 2014 में बीजेपी (BJP) की सरकार बनी थी तभी से एक देश एक चुनाव की आहट शुरू हो गई थी। इसके बाद दिसंबर 2015 में जब ‘लॉ कमीशन’ ने वन नेशन वन इलेक्‍शन पर अपनी रिपोर्ट देते हुए कहा था कि यदि देश में एक साथ चुनाव आयोजित करवाएं जाएं तो देश के करोड़ों रूपए भी बच सकते हैं और अचार संहिता बार बार लगाने की समस्‍या भी खत्‍म हो सकती है। इसके बाद प्रधानमंत्री ने स्‍वंय जून 2019 में सभी दलों की एक बैठक बुलाई थी। उस समय कुछ दलों ने इसका विरोध किया था, लेकिन इसके बाद यह मामला ठंडा हो गया था।

अब 1 सितंबर 2023 से सरकार ने एक देश एक चुनाव पर एक कमेटी बनाई है। जिसका अध्‍यक्ष पूर्व राष्‍ट्रपति रामनाथ कोविंद को बनाया गया है। जिससे ये अनुमान लगाया जाने लगा है कि कहीं ना कहीं सरकार फिर से एक देश एक चुनाव की तैयारी की तरफ बढ़ रही है। हालांकि, अभी एक देश एक चुनाव पर बनी कमेटी सरकार को राय देगी। इसके बाद ही आगे का फैसला लिया जाएगा।

दुनिया के किन देशों में अभी ये व्‍यवस्‍था है?

यदि हम एक देश एक चुनाव की बात करें तो यह अबतक दुनिया के केवल कुछ ही देशों में लागू है। जिससे आप समझ सकते हैं कि ये व्‍यवस्‍था बनाना कितना जटिल काम है। इस समय ब्राजील, कोलंबिया, फिलीपींस, दक्षिण अफ्रीका और स्‍वीडन में एक साथ चुनाव होते हैं। हालांकि, हम आपको बता दें कि यहां पर राष्‍ट्रपति को ही चुनाव में चुना जाता है। इसलिए यहां पर भारत से काफी आसान प्रक्रिया है।

एक देश एक चुनाव के फायदे?

एक देश एक चुनाव क्‍या है को समझने के बाद आप सोच रहे होंगे कि आखिर एक देश एक चुनाव की जरूरत क्‍या है। क्‍योंकि जब 1970 से ये प्रक्रिया चली आ रही है तो इसे आगे भी चलने दिया जाए। लेकिन इसके पीछे कई कारण आइए एक बार उन कारणों को समझते हैं।

हर समय देश में चुनावी माहौल बना रहता है

One Nation One Election की जरूरत आज हमारे देश में इसलिए पड़ी है क्‍योंकि आज आप देखेंगे कि हर समय हमारे देश के किसी ना किसी राज्‍य में चुनाव होता ही रहता है। ऐसे में ये कहना कि लोग सही मायने में कभी चुनाव के मूड से बाहर आ ही नहीं पाते हैं। हर समय लोग राज्‍यों के चुनाव के नतीजों का ही इंतजार करते रहते हैं।

सरकार को काम करने में परेशानी

जब हमारे देश में कहीं ना कहीं चुनाव आते रहते हैं तो इससे पार्टियों को काम करने में परेशानी होती है। उदाहरण के लिए हमारे देश में आज बीजेपी और कांग्रेस दो बड़ी पार्टी हैं। इस समय बीजेपी की केन्‍द्र में सरकार है लेकिन जब भी कहीं चुनाव आता है तो वहां प्रचार के लिए प्रधानमंत्री और कई बड़े मंत्रियों को जाना पड़ता है। इससे उनका काम प्रभावित होता है।

ठीक इसी तरह से जिन राज्‍यों में कांग्रेस की सरकार है वो भी जब किसी राज्‍य में चुनाव आता है तो अपने स्‍टार प्रचारकों को वहां भेज देते हैं। जिससे उस राज्य का काम एक तरह से रूक जाता है। इससे राजनेता तो परेशान होते ही हैं, साथ ही जनता के अटके काम भी चुनाव के दौरान रूक जाते हैं।

हर चुनाव पर प्रचार प्रसार का खर्च

हम सभी जानते हैं कि जब चुनाव आता है तो हर पार्टी और सरकार बड़े बड़े विज्ञापन देकर अपना प्रचार करती है। इन सब चीजों में कई करोड़ रूपए खर्च होते हैं। यानि चुनाव के आते ही जो पैसा जनता के हित में खर्च किया जा सकता था, वो चुनाव प्रचार में खर्च होने लगता है। और इसमें पार्टियों की मजबूरी भी होती है क्‍योंकि बिना प्रचार के उन्‍हें वोट नहीं मिलेंगे।

चुनाव पर हजारों करोड़ रूपए खर्च

One Nation One Election की जरूरत इसलिए भी पड़ी क्‍योंकि जब हमारे देश में समय समय पर चुनाव होते हैं तो इसमें काफी ज्‍यादा पैसा खर्च होता है। क्‍योंकि चुनाव आयोग के कर्मचारी कभी किसी राज्‍य में तैयारी करते हैं, तो कभी केन्‍द्र सरकार के चुनाव की तैयारी करते हैं। जिसमें लोगों की ड्यूटी लगाने से लेकर वोटिंग की मशीनों को इधर से उधर ले जाना शामिल होता है। इसमें लोकसभा चुनावों का खर्च केन्‍द्र सरकार वहन करती है जबकि राज्‍य के चुनावों का बोझ राज्‍य सरकार पर पड़ता है।

सुरक्षा बलों को परेशानी

जब हर राज्‍य में अलग अलग चुनाव होते हैं तो इससे सेना की परेशानी भी बढ़ जाती है। क्‍योंकि मान लीजिए इस महीने दिल्‍ली में चुनाव हैं तो सभी की ड्यूटी दिल्‍ली लगानी होगी, लेकिन अगले 2 महीने बाद गोवा में चुनाव हैं तो सभी को अब वहां पर ले जाना होगा।

लेकिन यदि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ होंगे तो गोवा के लोग 5 साल में एक बार एक ही साथ वोट दे देंगे। जिससे एक तरह से सारा खर्च आधा हो जाएगा। क्‍योंकि चुनाव चाहे छोटा हो या बड़ा सुरक्षा का उसमें बेहद अहम योगदान होता है।

अचार संहिता से परेशानी

हम सभी जानते हैं कि जब भी चुनावों की तारीख घोषित होती है तो अचार संहिता लगा दी जाती है। जिसके बाद सरकार किसी तरह की नई योजना ना तो लागू कर सकती है, ना ही घोषणा कर सकती है। ऐसे में सभी राज्‍यों में एक बार लोकसभा चुनाव के समय अचार संहिता लगा दी जाती थी।

जबकि दूसरी बार जब राज्‍य में चुनाव आते थे तो अचार संहिता लगा दी जाती थी। इससे राज्‍य सरकार को काम करने में परेशानी होती थी। यानि हर तरह के काम रूक जाते थे। क्‍योंकि चुनाव आयोग ने अचार संहिता की घोषणा कर दी है। जबकि एक साथ चुनाव होंगे तो 5 साल में केवल एक बार ही अचार संहित लगानी होगी।

एक देश एक चुनाव के नुकसान?

यदि हम One Nation One Election की बात करें तो इसके अपने नुकसान भी हैं। क्‍योंकि 1970 के बाद से देश के लोगों और राजनैतिक दलों ने काफी सारे तरीके अलग अलग बना लिए थे। जिससे आज यदि एक देश एक चुनाव लागू होता है इसके नुकसान भी देखने को मिलेंगे।

लोगों का मत प्रभावित होगा

अभी तक हमारे देश में काफी सारे लोग ऐसे थे जो देश में प्रधानमंत्री तो किसी और को चाहते थे लेकिन अपने राज्‍य में किसी दूसरे दल की सरकार चाहते थे। क्‍योंकि उन्‍हें लगता था कि उनके राज्‍य को बेहतर तरीके से वो ही पार्टी चला सकती थी।

लेकिन जब एक देश एक चुनाव की व्‍यवस्‍था लागू कर दी जाएगी। तो उनको मत चुनने में काफी परेशानी होगी। क्‍योंकि एक दिन के अंदर दो अलग अलग पार्टियों को वोट देना अपने आप में काफी जटिल फैसला है। ऐसे में संभव है कि वोटर एक पार्टी को केन्‍द्र और राज्‍य दोनों में चुन ले।

विधानसभा भंग करने पर समस्‍या

जैसा कि हमने आपको ऊपर बताया कि एक देश एक चुनाव की व्‍यवस्‍था आजादी के समय लागू थी। लेकिन बीच में कई राज्‍यों की विधानसभा भंग करनी पड़ी। जिससे ये व्‍यवस्‍था खराब हो गई। जो कि हमारे देश में बेहद आम बात है। क्‍योंकि कई बार गठबंधन करके सरकार तो बन जाती है, लेकिन वो पूरे 5 साल नहीं चल पाती है।

ऐसे में यही समस्‍या फिर आ सकती है। क्‍योंकि यदि लोकसभा चुनाव के 1 साल बाद ही किसी राज्‍य की विधानसभा भंग करने की नौबत आ गई तो अगले चुनाव क्‍या वहां केवल शेष विधानसभा कार्यकाल के लिए होंगे या 5 साल के लिए ये बड़ा सवाल आ जाएगा। इसी तरह यदि कभी समय से पहले लोकसभा में सरकार गिर गई तो क्‍या होगा? यानि संभव है कि कुछ सालों बाद फिर से वही व्‍यवस्‍था बन जाए जिससे आज हम लोग दोचार हैं।

क्षेत्रीय दलों को नुकसान होगा

यदि आज की तारीख में एक देश एक चुनाव की व्‍यवस्‍था लागू होती है तो कई राज्‍य जहां क्षेत्रीय दलों की सरकारें हैं उनको साफ तौर पर नुकसान देखने को मिलेगा। क्‍योंकि अगर लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ होते हैं तो हमेशा लोग जिस पार्टी को केन्‍द्र में देखना चाहते हैं उसे ही राज्‍य में भी चुन लेंगे। जिससे उन क्षेत्रीय दलों के अस्‍तित्‍व पर ही संकट आ जाएगा। क्‍योंकि प्रधानमंत्री के चेहरे के आगे उनका कद बेहद छोटा प्रतीत होगा।

उदाहरण के लिए यूपी, बिहार, बंगाल, हरियाणा और महाराष्‍ट्र जैसे राज्‍यों में कई दल ऐसे हैं जिनकी उस राज्‍य में पकड़ मजबूत है, लेकिन देश के चुनावों में उनका कोई विशेष योगदान नहीं है। ऐसे में वाजिब सी बात है कि ये दल कभी नहीं चाहेंगे कि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ हों।

5 साल तक एक ही पार्टी का शासन

वैसे तो हमारे देश में आज भी 5 साल तक एक ही पार्टी का शासन होता है। लेकिन अभी लोकसभा के बाद जब भी किसी राज्‍य में चुनाव आते हैं तो दोबारा से पार्टियां सक्रिय हो जाती हैं। जिससे उनको जनता के बीच जाना होता है और नई नई योजनाएं लानी पड़ती हैं। और अगर उस चुनाव में हार हो जाती है तो उन्‍हें मंथन भी करना पड़ता है।

लेकिन यदि एक बार में सभी चुनाव हो जाएंगे तो संभव है कि जो पार्टी जीत हासिल करे वो एकदम शांत हो जाए क्‍योंकि उसे पता रहेगा कि अब 5 बाद ही वोट होंगे। ऐसे में 4 साल तक चुपचाप बैठे रहो और अंतिम 1 साल में जनता के नई नई योजनाओं की घोषणा की जाएगी।

EVM मशीनों की कमी की समस्‍या

अगर एक देश एक चुनाव की व्‍यवस्‍था लागू होती है तो संभव है कि हमारे देश में ईवीएम मशीनों की कमी हो जाए। क्‍योंकि अभी तक हमारे पास ऐसी व्‍यवस्‍था थी कि यदि आज यहां चुनाव हैं तो यहां करवा लिए जाएंगे। जबकि आगे फिर जहां चुनाव होंगे यही मशीनें वहां उठाकर ले जाएंगे। लेकिन यदि सभी जगह एक ही बार में चुनाव होंगे तो संभव है भारी मात्रा में सरकार को ईवीएम मशीनों की खरीद करनी पड़े।

क्‍या हमारे देश में एक देश एक चुनाव संभव है?

एक देश एक चुनाव के बारे में जानने के बाद आप सोच रहे होंगे कि यदि ये काम वाकई इतना आसान होता तो पिछले 63 साल में क्‍यों किसी ने नहीं किया तो हम आपको बता दें कि इस काम में काफी ज्‍यादा समस्‍या है। क्‍योंकि मान लीजिए मई 2024 में लोकसभा के चुनाव हैं, तो जरूरी नहीं है कि उसी के आसपास सभी राज्‍यों में चुनाव हों।

मान लीजिए कि जिन राज्‍यों में मई 2024 के कुछ महीने आगे या पीछे चुनाव हैं तो उन्‍हें एक देश एक चुनाव के लिए मनाया जा सकता है। लेकिन जिन राज्‍यों का कार्यकाल अभी 2 से 3 साल का है वो किसी भी तरह से पहले चुनाव करवाने के लिए तैयार नहीं होंगे। खासतौर पर जिन राज्‍यों में बीजेपी का शासन नहीं है। ऐसे में यह तय है कि यदि सरकार उनके ऊपर दबाव बनाती है तो वो सुप्रीम कोर्ट चले जाएंगे और मामले का अंतिम रास्‍ता सुप्रीम कोर्ट ही सुझााएगा।

जनता के लिए क्‍या सही है?

यदि हम जनता के पक्ष की बात करें तो जनता के‍ लिए एक साथ चुनाव ही सही माना जाएगा। क्‍योंक‍ि इससे हर आदमी एक दिन में ही लोकसभा और विधानसभा में अपनी सरकार चुन लेगा। साथ ही उसे बीच बीच में अचार संहिता की समस्‍या से भी नहीं गुजरना होगा।

लेकिन इसका एक नुकसान भी है कि यदि आज केन्‍द्र सरकार से लोग खुश नहीं होते हैं तो आगे किसी भी राज्‍य में चुनाव होते हैं तो वहां दूसरी पार्टी का चुनाव करके केन्‍द्र सरकार को अपना जनमत वोट से पहले ही बता देते थे। लेकिन एक साथ चुनाव होने पर सीधा फैसला करना होगा।

FAQ

एक देश एक चुनाव क्‍या है?

एक देश एक चुनाव की व्‍यवस्‍था के अदंर लोकसभा और विधानसभा के चुनावों को एक साथ करवाया जाता है। जो कि अभी अलग अलग होते हैं।

एक देश एक चुनाव क्‍यों जरूरी है?

एक देश एक चुनाव हमारे देश में इसलिए जरूरी है क्‍योंकि इससे चुनाव पर होने का वाला खर्च कम होगा और बार बार अचार संहिता लगाने की समस्‍या खत्‍म हो जाएगी।

एक देश एक चुनाव का नुकसान?

एक देश एक चुनाव का नुकसान ये है कि इससे क्षेत्रीय पार्टियों के वोटर उनसे दूर हो जाएंगे। साथ ही संभव है कि केन्‍द्र और राज्‍य में एक ही सरकार बने।

क्‍या एक देश एक चुनाव से सभी दल सहमत हैं?

नहीं, दिसंबर 2019 में प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने एक बैठक बुलाई थी। लेकिन उस बैठक में कुछ दल ऐसे थे जिन्‍होंने एक देश एक चुनाव का विरोध किया था।

यदि आज एक साथ चुनाव हुए तो?

यदि आज की तारीख में ये व्‍यवस्‍था लागू की गई तो मई 2024 के आते ही सभी राज्‍यों की विधानसभाओं को भंग करना पड़ेगा। जिसके बाद पूरे देश में एक साथ चुनाव आयोजित किए जा सकते हैं।

जनता का हित किसमें है?

जनता का हित एक साथ चुनाव करवाने में ही है। क्‍योंकि इससे उसे बार वोट के झंझट में नहीं फंसना होगा और अचार संहिता के कारण उसके काम भी नहीं रूकेंगे।

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Conclusion

आशा है कि कि अब आप समझ गए होंगे कि एक देश एक चुनाव क्‍या है। One Nation One Election को जानने के बाद आप समझ गए होंगे कि इसके कुछ फायदे हैं तो कुछ नुकसान भी हैं। लेकिन यह कहना कि ये काम इतना आसान है, ये बेहद ही गलत होगा। क्‍योंकि लोकतंत्र में सरकार कोई भी फैसला बिना सभी की सहमति के नहीं ले सकती है। इसलिए अभी कुछ कह पाना जल्‍दबाजी होगी।

उम्र में युवा और तजुर्बे में वरिष्ठ रोहित यादव हरियाणा के रहने वाले हैं। पत्रकारिता में डिग्री रखने के साथ इन्होंने अपनी सेवाएं कई मीडिया संस्थानों को दी हैं। फिलहाल ये पिछले लंबे समय से अपनी सेवाएं 'All in Hindi' को दे रहे हैं।

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